गुरुवार, 30 जून 2011

अधूरे सपने


सोच रहा था यु ही चलते  - चलते
क्यों न करू लूँ कुछ काम
क्यों भटकता फिरता हूँ इधर - उधर
शायद जिंदगी बन जाये
आ जाये भारी-भरकम रकम
संवर जाये जीवन का सरगम
कार की छवियाँ लटकाए घूमता रहूँ
शायद बचपना आ गया था लौट के
जब होता था अक्सर मन में लटके -झटके
उदूंगा एक दिन मै भी आकाश में
हर क्षण रहूँगा इन्द्रधनुष के पास में
यु ही सोचते - सोचते कहाँ  मै भटक गया
शायद जीवन ही मुझसे खटक गया
न रही आशा न विश्वाश
हर कोई गंतव्य को बढ़ गया
मै रह गया यूँ ही सोचते -सोचते
निर्विकार - निर्विरोध
पर स्वंय को खोजते-खोजते
भीड़ थी हर जगह यहाँ
पर न दिखे मेरे अपने
यूँ ही तड़पते रहे अधुरा सपने
माही सिंह (मनीष कुमार वत्स )

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