दरवाजे पर खँखारते बूढ्ढे पर मन भिन्ना गया
होश खो रहा थ मेरा , पर याद आ गया
कि ये बाबूजी है ़।
वही बाबूजी जिनके कांधे पर बैठ कर
खेतों का चक्कर लगाया करता था
गंदा भी कर दिया था जिनके कांधे को कई बार
पर खँखार पर मन भिन्ना गया
सोचा बूढ्ढे आखिर होते क्यों है?
हम बेवजह इन्हे ढोते क्यों हैं?
मन प्रश्न किये जा रहा था पर आत्मा को
याद आ गया कि ये बाबूजी है।
वही बाबूजी जिनका अंश हुँ मै
जिनका रक्त बहता है मेरे शरीर मे
जिसने खून पसीने से सींचा है मूझे
बचपन से जवानी तक खींचा है मूझे
पर रास्ते पर पङे खँखार देखकर मन भिन्ना गया
तभी उनकी पुकार सुनकर याद आ गया
कि ये बाबूजी हैं
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें