रविवार, 4 सितंबर 2011

भगवान मुझे इक साली दे

भगवान मुझे इक साली दे 
गोरी दे या काली दे 
भगवान मुझे इक साली दे 
सीधी दे , नखरेवाली दे 
या गरम चाय की प्याली दे  
भगवान मुझे इक साली दे 
ससुराल मै जब भी जाता हुँ 
गुमसुम ही बैठा रहता हुँ 
ना करे कोई मिन्नते , ना ही कोई गाली दे 
भगवान मुझे इक साली दे 
जब मिलते हैं दोस्त-यार 
होती हैं महफिलें तैयार 
करते हैं वो बाते  उस पल 
साली जैसी दिलवाली के 
भगवान मुझे इक साली दे 
हे। प्रभु । ईश्वर मेरे 
कष्ट मुझे दे-दे बहुतेरे 
पर इस सूखे संसार में 
मुझे साली की भरी थाली दे 
भगवान मुझे इक साली दे ।

रविवार, 28 अगस्त 2011

मोहब्बत भरी जिंदगी

रश्क हे जिन्दगी को बनाया किसने
महकते हुये आंचल से सजाया किसने
हरेक कदम पे जिन्दगी मे खुशियाँ बिखेर दी
पर गम के सायों से रुलाया किसने

जिंदगी में मोहब्बत भरो खुदा - ए - दीन की तरह
जिंदगी में फितरत भरो फिल्म के सीन की तरह
जिंदगी को जिओगे ऐसे तो मज़ा आयेगा
बाद में रुसखत  करो तमाशेबीन की तरह

जिंदगी के लम्हों को यूँ दिल में बसा लो
आसमाँ से मानो तुम सुरमा चुरा लो
वक्त की नज़ाकत को समझकर यारों
जिंदगी को मोहब्बत की  दुनिया बना लो

आते हैं सपनो मे बख्शीशें हज़ार
होती है अक्सर हसीनो से आँखे चार
सपने तो टूटते हैं अक्सर यारों
सपनो को जिंदगी का मकसद बना लो

तुम पाओगे की जिंदगी जहीन हो गयी
खुशी के आईने में  आमीन हो गयी
गम की आहट ना आयेगी तेरे दर पे कभी
हर मोड पे हर लम्हा रंगीन हो गयी ।

शुक्रवार, 12 अगस्त 2011

देख तुझे ओ । प्रियंका --------

व्यथित हृदय के मरूक्षेत्र में जन्मा एक
          बीज प्रेम का
हर्षित हुई प्रकृति धरा तब 
      सौभाग्य था मानव जीवन का
चंचल मन स्वप्न में लीन हुआ
      चहक उठा अंग-अंग तन का
            देख तुझे ओ । प्रियंका


नयनों के सुरमयी  क्षेत्र कामुकता का 
     प्रवाह हुआ 
हृदय के झंकृत तारों में व्याकुलता का
        आभास हुआ 
सुगंधित हो उठी सांसे 
ढीला पड गया बंधन मन का  

            देख तुझे ओ । प्रियंका


व्यथित हृदय में तुम प्रेम 
   आभास हो
अमावस्या में तुम प्रकाश हो
मरणशय्या पर अंतिम सांस हो
चुभता है एक शुल हमेशा 
कब आयेगी घडी मिलन का 
            देख तुझे ओ । प्रियंका


ऐ । नौजवानों

है देश आज मंझधार में ---
है काल में कलवित हुआ
भ्रष्ट शासन के विपद के
आङ में कुंठित हुआ

                         निज जहाँ है ये हमारा
                          प्राण प्यारा था सदा
                           चंद लोभियों के दहकती
                            गाँठ में उलझा हुआ

                                                       शायद भ्रम था हमारा
                                                        स्वयं शासन सुयोग का
                                                       पर बन गया सपना हमारा
                                                       वस्तु - दानवों के भोग का
                                                                           
                                                                                            बेच डाला इस जमीं को
                                                                                              चंद डालरों के मोल में
                                                                                              कर डाला सौदा हमारा
                                                                                              शादी की अपनी ढोल में
                                                                         
                                                                                                                            भर उठा उनका खजाना
                                                                                                                           पर हम दहलते रहे
                                                                                                                       कभी बारुद की ढेर पर तो
                                                                                                                    कभी जठराग्नि में जलते रहे
                                                                                                                                                   
                                                                                                                                                                                                                           
                                         जाग जाओ  ऐ। दीवानो
                                        इस राष्ट्र के ऐ । नौजवानो
                                        नव-विहान , नवलय का
                                      वक्त आज आन पडा
                                     है देश आज मंझधार में
                                    बस तुम्हे पुकार रहा ।



मनीष कुमार वत्स "माही"













सोमवार, 1 अगस्त 2011

‍१९ बसंत

तेज रवि की रश्मि में खोली थी मैने आँखे
    देख धरा की स्वर्णिम आभा
खिल गयी थी मेरी बाँछे
बैठ प्रकृति की आँचल में
पल-पल का प्यार लिया
कभी-हँसकर तो कभी रोकर मैने
उन्नीस बसंत गुजार दिया

सुख-दुख है जीवन की माया
कहीं धुप तो कहीं छाया
क्रोध - घृणा से अनगढ मेल को
जीवन से दुत्कार दिया
कभी हँसकर तो कभी----

तृण-तृण को लडते देखा
स्वजनो को मरते देखा
हिंसा पर प्रतिहिंसा
बंधुओं को करते देखा
हृदय की व्यथित तरंगो को
प्रेम में आत्मसात किया
कभी हँसकर तो कभी----

मोह , इच्छा या लिप्सा लालसा
मन ने बनाया आत्मा को काल सा
मृगनयनी या फूलकुमारी
हृदय बसी थी राजकुमारी
मन के कामुक उमंगो को
कल्पना का उडान दिया
कभी हँसकर तो कभी -----

अमूल्य जीवन है नश्वर फिर भी
अमर रहुँगा मै मर कर भी
सह संताप हर पल , हर दम
प्रगति पथ पर रहुँगा फिर भी
उदित सुर्य की भाँति मैने
 जीवन को प्रकाश दिया
कभी हँसकर तो कभी रोकर------

हँसता हुँ कि जीवन पाया
रोता हुँ कि जग को नहीं हँसाया
हँसने रोने के अजब मेल में
जीवन को अपने बाँध लिया
कभी हँसकर तो कभी रोकर------

रविवार, 31 जुलाई 2011

ई सरकारी जमीन हई

---------- रात भर मै झुमरी काकी के बारे में सोचता रहा ---- आखिर क्यों भगवान इस तरह की लम्बी उम्र देता है  जिसमें इंसान को रोटी तक के लिये तरसना पडे , पता नही क्यों मैं झुमरी काकी से भावनात्मक रुप से बंधने लगा था , शायद रात के वक्त हर आदमी के साथ ऐसा होता है , दिन में जो भी उसने बुरा देखा या सुना हो उस पर मंथन करना लाजिमी होता है ,एक सपने जैसी अनुभूति होती है इसीलिये तो सुबह जब मै उठा तो  रात के सारे वाकये भूल चुका था , झुमरी काकी की सारी बातें जेहन से धुंधली पड चुकी थी , मैने नित्यक्रिया से छुटकारा पाया और खेतों की तरफ घूमने का प्रोग्राम बनाया , दरहसल एक लम्बे अरसे के बाद कभी-कभी गाँव जाता हूँ सो सुबह के प्रकृति के दीदार से भला कौन चुकना चाहता है , निकल पडा -- सोचा सैर -सपाटा भी हो जायेगा और खेतों को भी देख लूँगा , अभी आहर के निकट पहुँचा होउन्गा कि किसी के जुबान से भद्दी -भद्दी गालियों का संगीतमय उच्चारण सुनकर ठिठक गया---- सामने देखा तो गाँव के मुखिया का लडका अपने खेत मे खडा जुबान से काँटे निकाल रहा है , था ही वह उदंग्गड बचपन से ही मेरे साथ ही पढता था , मास्टर जी को भी नही छोडता था , मैने वहाँ रुकना उचित नही समझा और अपने कदम बढा दिये पर-------सामने सुकर लेकर आती वृद्धा को देखकर ठिठक जाना पडा ---- निसंदेह यह झुमरी काकी थी , रात की बातें फिर से ताज़ा हो गयी ---- मन किया  कि मुखिया के बेटे को तमाचा जड दूँ पर हिम्मत नही हुई , सोचा क्यों बेबजह का पंगा लूं ,पर असहाय झुमरी काकी के लिये कूछ करना चाह रहा था , मैं भी तो असहाय ही था ----- इसी उधेडबुन में फँसा कभी अपने - आपको तो कभी मुखिया के बेटे को कोस रहा था कि एक कडकती आवाज सुनकर चौंक गया-------वास्तव में आवाज में बुलन्दी थी----- ई तोहर बाप के खेत नय हऔ कि तो हमरा गारि देमही ------ ई पर सरकार के अधिकार है ----- और हमनी भी भोटवा दे हियै------- ई गरमज़रुआ खेत हकै तौ कब्जा कर लिहनी तो कि------( ये तुम्हारा बाप का खेत नहीं है , जो तुम मुझे गाली दे रहे हो , इस पर सरकार का अधिकार है , और हम लोग भी वोट देते हैं , ये तो सरकारी जमीन है, तुम लोग कब्जा कर लिय हो तो क्या?)  झुमरी काकी के मुँह से वोट का महत्व और अपने अधिकार की बात सुनकर मेरा दिल बाग-बाग हो गया , उनकी जानकारी की कला से मै हैरान भी था----- मै उनसे बात करने को उत्सुक हो गया-----पर सामने खडे मुखिया के लडके को देखकर अपने कदम बढा लिये------शेष अगले भाग में-------

शनिवार, 30 जुलाई 2011

झुमरी काकी ‍१२५ साल की-----------

दुबला-पतला शरीर, चेहरा झुर्रियों से भरा हुआ ,चलती है ऐसे झुककर मानो पुरे संसार का बोझ उसके कांधे पर रखा है , पर आवाज बडा ही गर्वीला और कडकदार , अभी परसों ही रामजीतन के बेटे को डाँट रही थी , डाँट तो उसे रही थी परन्तु हलक सुनने वालों के सूख रहे थे , कितनी उमर हो गयी होगी इनकी मैने वहाँ खडे एक रमेसर चचा से पुछा , बेटा हमनी के कि पता , ई तो तोर बबे बताय सको हखुँ (मुझे क्या पता ये तो तुम्हारे दादा ही बता सकते हैं) , शाम को जब सब लोग दलान में बैठे थे , मुझे रहा नही गया  झुमरी काकी के पडताल का इससे अच्छा मौका मुझे नही मिलने वाला था , सो पूछ दिया कि झुमरी काकी का क्या उमर हुआ होगा , यही ७० साल , पापा तपाक से बोले , नही ९० साल तो हुआ ही होगा राघो चचा बोले ,अरे तुम लोग को कुछ पता भी है या ऐसे ही बोलते जा रहे हो, अबकी दादा बोले थे , झुमरी का जनम तब हुआ था जब मै पैदा भी नही हुआ था , मेरे पिताजी बताते थे कि जब बंगाल बँटा था उसके ५ साल पहले ही वह भिखुआ की जोरु बनकर गाँव में आयी थी  , यानि लगभग ‍१२५ साल से भी उपर की है वो मैने सोचा ----अच्छा दादा जी ये भिखुआ कौन था और कब मरा --- मेरी दिलचस्पी बढ रही थी , भिखुआ हमारा जन था ,वह हमारा हरेक काम करता था , ऊसका बेटा था जगेसर जो अभी अपना हल जोतता है, भिखुआ शादी के ‍१५ साल बाद ही मर गया था , मैने भी उसे नही देखा है , अच्छा दादा जी ये झुमरी काकी तो बंजारिन है , इसके पास जमीन जायदाद भी नही , सरकार इसके लिये कुछ नही करती ,हाँ कम से कम इसे वृद्धा पेंशन तो मिलनी ही चाहिये, बेटा जितना तुम सोचते हो , जितना कानुन है उतना सब कुछ पुरा हो जाये तो सबकी जिन्दगी बन जाये ------- पर हकीकत में ऐसा नही होता --- सरकार की योजनायें बस कागजों तक ही सीमित रहती है---- मै सरकारी पैसों के दुरुपयोग और सरकारी  अफसरों के कर्तव्यहीनता और लोलुपता पर विचार करने लगा ----मुझे लगा कुछ तो करना चाहिये ------इस ‍१२५ साल की काकी के लिये जिसे शायद पेट भर अनाज मिलता हो------- शेष अगले भाग में---------